नियति

कमलानाथ

नियति
(9)
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सारांश

यह मार्मिक कहानी है सुनीता की, जब से वह तीन चार साल की थी, चुलबुली सी, होशियार। मेरी बेटी मिन्नी के साथ खेला करती थी। कभी ‘बिल्ली’ बन कर मिन्नी रूपी ‘शेर’ से डर कर भागती थी, कभी उसके चाबी वाले खिलौनों को दूर से उठा लाकर उसे दे देती थी। मिन्नी अक्सर उसे टॉफ़ी और बिस्कुट दे दिया करती थी। मिन्नी के पुराने कपड़े हम उसे दे दिया करते थे जो उसे बड़े अच्छे लगते थे और वह उन्हीं को पहन कर आती थी। नियति का कोई अन्य विधान, कोई प्रारब्ध भी होता है जिसका इस जन्म में किये किसी काम से शायद कोई सम्बन्ध नहीं होता। तभी तो हँसती खिलखिलाती मासूम बच्ची के भाग्य में जो लिखा था वह सब उसने करवाया जिसकी न उसने कभी कल्पना की थी, न वह उसकी हक़दार थी। प्रारब्ध के इस चक्र का नियंता कोई और ही होता है और इसके वशीभूत होकर हम अनजाने ही ऐसी ऐसी अच्छी या बुरी परिस्थितियों में घिर जाते हैं जो हमें अकल्पनीय सीमाओं तक उठा कर धकेल देती हैं। सुनीता का दुर्भाग्य उसे कैसे कैसे मोड़ों पर लाकर खड़ा कर रहा है और इस जटिल मकड़जाल में वह बरबस एक निरीह और असहाय पतंगे की तरह आकर फँस गई है।
Nakul
very touching.. nice concept but real
Savitri
garib hona hi sabsay bda sand h
मधुलिका
नारी जीवन को दर्शाती एक मार्मिक कथा
Rajendra Kumar
बाद मुदत के इस तरह का प्रयोग किया है।आप सभी जो इस कार्य का हिस्सा है।में उन्हें दिल से धन्यबाद देना चाहता हु
ashish
समाज में ऐसा भी होता है?
Mamta
Bahut marmik kahani 😥😥
Abhishek
Hd hai yr koi aisa kaise kr skta hai kaise kaise kaise
sandeep
अति मार्मिक कहानी
Anjali
no words to describe nice Ji
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